जातिगत जनगणना के मौजूदा फॉर्मेट पर अशोक गहलोत ने उठाए सवाल, केंद्र से की नया प्रश्नावली प्रारूप तैयार करने की मांग
https://youtu.be/WM6NvvKi_lo?si=0r-AhSfqIqKKVF3yजातिगत जनगणना के मौजूदा फॉर्मेट पर अशोक गहलोत ने उठाए सवाल, केंद्र से की नया प्रश्नावली प्रारूप तैयार करने की मांग
जयपुर/अहमदाबाद: राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित जातिगत जनगणना प्रक्रिया के प्रारूप को "गंभीर त्रुटिपूर्ण" (Fundamentally Flawed) बताते हुए सवाल उठाए हैं। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए गहलोत ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीयत में खोट है और वर्तमान व्यवस्था से पिछड़े वर्गों (OBC), अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) तथा अन्य वंचित समुदायों के वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आ पाएंगे।
मुख्य बातें:
खुले प्रश्न (Open-ended System) पर आपत्ति: अशोक गहलोत ने कहा कि जनगणना की प्रश्नावली के प्रश्न संख्या 10 में ओपन-एंडेड विकल्प दिया गया है, यानी नागरिक जो बताएंगे, प्रगणक वही लिख देंगे। भारत में एक ही जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में कई उपनामों, बोलियों और वर्तनी (स्पेलिंग) से जाना जाता है। बिना प्री-डिफाइंड सूची (ड्रॉप-डाउन लिस्ट) के एक ही जाति का डेटा हजारों हिस्सों में बंट जाएगा, जिससे आंकड़े अविश्वसनीय हो जाएंगे।
ड्रॉप-डाउन लिस्ट लागू करने की मांग: पूर्व मुख्यमंत्री ने तेलंगाना और बिहार में कराए गए जातिगत सर्वे की तर्ज पर प्रमाणित जाति सूची (ड्रॉप-डाउन लिस्ट) का इस्तेमाल करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि देश की लगभग 4,200 जातियों की सूची केंद्र और राज्य सरकारों के पास पहले से उपलब्ध है।
सर्वदलीय बैठक और विशेषज्ञों से परामर्श: गहलोत ने मांग की कि वर्तमान प्रश्नावली प्रक्रिया को वापस लेकर राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और जनता के साथ व्यापक विचार-विमर्श करके नई प्रश्नावली तैयार की जानी चाहिए।
सामाजिक न्याय पर असर: उन्होंने कहा कि जब तक सटीक और वास्तविक जनसंख्या आंकड़े नहीं मिलेंगे, तब तक नौकरियों, शिक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण नीति की निष्पक्ष समीक्षा संभव नहीं होगी।
गहलोत ने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार के पास अभी भी समय है कि वह 2027 में देशभर में लागू होने से पहले इस पूरी प्रक्रिया और प्रश्नावली के प्रारूप में सुधार करे ताकि हर वर्ग को उनका अधिकार और सामाजिक न्याय मिल सके।

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