पातेपुर प्रखंड के विभिन्न पंचायतों के सर दर्द बना नीलगाय एवं घोड़प्रस की आतंक से किसान दिन प्रतिदिन संख्या बढ़ रही है इन जानवरों ने किसानों के लिए सब से बड़ा सरदर्द बन गया है
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बिहार वैशाली पातेपुर से रंजीत कुमार की रिपोर्ट
बिहार वैशाली पातेपुर से रंजीत कुमार की रिपोर्ट
नीलगाय एंव घोड़प्रस की आतंक से किसान परेशानhttps://youtu.be/2SNrZSgLJQ8?si=edfnqg3Z7IfFhW5L
पातेपुर प्रखंड के विभिन्न पंचायतों के सर दर्द बना नीलगाय एवं घोड़प्रस की आतंक से किसान दिन प्रतिदिन संख्या बढ़ रही है इन जानवरों ने किसानों के लिए सब से बड़ा सरदर्द बन गया है साग सब्जी गेहूं दलहन तम्बाकू की फसलों काफी बर्बाद करती है नीलगाय व घोड़प्रस द्वारा फसलों की क्षति की भरपाई नहीं होने को लेकर किसानों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है नीलगाय व घोड़प्रस को मारने का आदेश सरकार प्राप्त नहीं है इससे निजात पाने के लिए तरह तरह की तरकीब कर के थक चुके हैं इसके बावजूद भी फसलों की क्षति पहुंचाने से बाज नहीं आ रहा है सबसे बड़ी चिंता का मुख्य विषय है की नीलगाय एक साल में दो बार बच्चा देती है।
नीलगाय और घोड़प्रस के बढ़ते आतंक से बिहार के किसान परेशान, सरकार की नीति पर सवाल
**वैशाली (पातेपुर), 24 जनवरी 2026** – बिहार के वैशाली जिले के पातेपुर प्रखंड में नीलगाय (घोड़प्रस) का आतंक किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है। विभिन्न पंचायतों के किसान दिन-ब-दिन इन जंगली जानवरों से त्रस्त हो रहे हैं। नीलगाय और घोड़प्रस के झुंड साग-सब्जी, गेहूं, दलहन, तंबाकू और अन्य फसलों को बड़े पैमाने पर बर्बाद कर रहे हैं, जिससे किसानों को लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि ये जानवर रात-दिन खेतों में घुसकर लहलहाती फसलों को चर जाते हैं। नीलगाय की तेज प्रजनन क्षमता समस्या को और गंभीर बना रही है, क्योंकि एक मादा नीलगाय साल में दो बार बच्चे देती है, जिससे उनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। किसान तरह-तरह की तरकीबें अपनाकर थक चुके हैं – जैसे खेतों में डरावने पुतले लगाना, पटाखे बजाना या रातभर जागकर पहरा देना – लेकिन इन जानवरों का हमला रुकने का नाम नहीं ले रहा।
सबसे बड़ी चिंता का विषय फसल क्षति की भरपाई है। सरकार की ओर से कोई ठोस मुआवजा या प्रभावी राहत नहीं मिल रही, जिससे किसान आर्थिक रूप से टूट रहे हैं। कई किसान खेती छोड़ने की नौबत पर पहुंच गए हैं।
यह समस्या केवल वैशाली तक सीमित नहीं है। बिहार के लगभग सभी जिलों में नीलगाय और जंगली जानवरों (जैसे जंगली सुअर) का आतंक तेजी से बढ़ रहा है। नवादा, नालंदा, सीतामढ़ी, सारण, मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में भी किसान इसी समस्या से जूझ रहे हैं। राज्य में लाखों हेक्टेयर फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, लेकिन बिहार सरकार की ओर से अभी तक कोई निर्णायक और व्यापक समाधान नहीं निकाला गया है।
हालांकि सरकार ने कुछ जिलों में शिकारियों को अनुमति देकर नीलगायों को मारने की छूट दी है और फसल क्षति पर मुआवजा बढ़ाने की घोषणा की है (जैसे प्रति हेक्टेयर 50,000 रुपये तक), लेकिन ये कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं। किसानों का आरोप है कि सरकार इस गंभीर मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान नहीं दे रही। नीलगाय को मारने का स्पष्ट और राज्यव्यापी आदेश न मिलने से समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
किसान नेता और प्रभावित किसानों ने बिहार सरकार से मांग की है कि तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाएं – जैसे नीलगाय को हानिकारक घोषित कर बड़े पैमाने पर नियंत्रण अभियान चलाना, बेहतर मुआवजा व्यवस्था लागू करना और वैकल्पिक फसल पैटर्न या वैज्ञानिक तरीकों से सुरक्षा प्रदान करना।
अगर सरकार ने जल्द कार्रवाई नहीं की, तो बिहार के अन्नदाता किसानों की स्थिति और खराब हो सकती है। क्या बिहार सरकार अब भी चुप्पी साधे बैठी रहेगी? यह सवाल हर किसान के मन में गूंज रहा है।
(रंजीत कुमार, पातेपुर से विशेष रिपोर्ट)


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