सुजानपुर में साढ़े तीन करोड़ की कटान रोधक परियोजना को निगल गई घाघरा* *पांच गांवों के ग्रामीणों पर मड़रा रहा कटान का खतरा*

*सुजानपुर में साढ़े तीन करोड़ की कटान रोधक परियोजना को निगल गई घाघरा* 

*पांच गांवों के ग्रामीणों पर मड़रा रहा कटान का खतरा*




देश का दर्पण/अख्तर अली।

निघासन खीरी।सुजानपुर में पांच गांवों की आबादी को बचाने के लिए एक वर्ष के अंदर साढ़े तीन करोड़ रूपयों की लागत में तैयार की गई कटान रोधक परियोजना को घाघरा नदी ने महज हफ्ते के अंदर निगल गई है। तेजी के साथ कटान कर रही घाघरा नदी के रूख को देख मुहाने पर आए पांच गांवों के ग्रामीणों में कटान का खतरा मड़राने लगा है। सभी ग्रामीण सुरक्षित स्थानों की तलाश शुरू कर दी है।घाघरा नदी के निशाने पर आए माथुरपुर, सहजदिया, लालापुर, मोटे बाबा और देवी पुरवा आदि पांच गांवों के ग्रामीणों में काटन को लेकर अफरा-तफरी का माहौल है। खेती-बाड़ी सब कुछ नदी में गवां चुके ग्रामीणों में अब उनका आशियाना उजड़ने का खौफ सताने लगा है। यदि समय रहते बचाव कार्य में तेजी नहीं दिखाई गई तो वह दिन भी अब दूर नहीं होंगे कि बारी-बारी से उपरोक्त सभी गांव नदी की कोख में समा जाएंगे। और करीब एक हजार परिवार बेघर हो जाएंगे। माथुरपुर, देवी पुरवा, सहजदिया और लालपुर गांव और नदी की दूरी महेज सौ मीटर शेष बची है। बाढ़ खंड विभाग के द्वारा उपरोक्त गांवों की आबादी को बचाने के लिए एक वर्ष के अंदर अलग-अलग तीन परियोजनाओं के माध्यम से साढे़ तीन करोड़ रूपयों की लागत से 780 मीटर कटान रोधक कार्य कराया गया था। जिसमें से करीब छह सौ मीटर घाघरा निगल चुकी है। कटान का आलम यह है कि काफी धीमी गति में दिन में बांस बल्ली और मिट्टी की बोरियां डालकर काटन रोधक कार्य कराए जाते हैं। और रात में वह घाघरा की कोख में शमा जाते हैं। जिससे सभी ग्रामीणों में विभाग के प्रति काफी रोष है। इस संदर्भ में बाढ़ खंड से एसडिओ बीडी गौतम ने बताया कि बचाव कार्य जारी है। बरसात की वजह से नदी का रुख भयंकर हो गया है। जिस वजह से नदी जबरदस्त कटान कर रही है। आबादी को बचाने के लिए पूरा प्रयास किया जाएगा।

*दूसरी बार घाघरा में शमा जाएंगे यह तीन गांव* 

घाघरा नदी ने पिछले दो दशकों में जबरदस्त कटान कर सैकड़ो किसानों की हजारों हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि निगलने के साथ ही माथुरपुर, सहजदिया और मोटे बाबा का वजूद खत्म कर दिया था। उपरोक्त तीनों गांवों के कटान पीड़ित ग्रामीण नदी से कोसों दूर सुरक्षित स्थानों पर जैसे तैसे अपना अपना आशियाना बनाकर गुजर बसर कर रहे थे। लेकिन घाघरा नदी को शायद वह भी मंजूर नहीं है अब तीनों गांव पुन: घाघरा के निशाने पर आ गए हैं। जिससे उनमें अपना आशियाना उजड़ने को लेकर अधिक बेचैनी है।

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